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मालखेड निवासिनी जगदम्बा का इतिहास

श्री देवेश्वर महाराज

मलखेड ग्राम में रेलवे लाइन के उत्तर बाजु में माँ भगवती अम्बिका का मंदिर है | इस मंदिर का निर्माण कब हुआ ? यह देवस्थान स्वयंभू है क्या ? मलखेड ग्राम को मलखेड नाम कैसे पड़ा ? यहाँ स्थित भानुमति नदी का महात्म्य क्या है ? आदि ढेर सारे सवाल मन में उत्पन्न होते है | तो इस पुरातन मंदिर का इतिहास कुछ पुराणों में तथा कुछ स्थानीय इतिहास में वर्णन है | उसीका कुछ सारांश - इस प्रकार है - सतयव्रत मनु के वंश में वृषभदेव नाम का राजा हुआ था | जो इस विदर्भ राज्य का शाशन करता था तथा इनको दस पुत्र थे | वृषभदेव ने अपने प्रत्येक पुत्र को राजधानी के चारों तरफ निवास स्थान बनवा दिए थे तथा उन् पुत्रों के ही नाम उन् बस्तियों को दिया था | उनमें से एक केतुमाल नाम का पुत्र था तथा उसने अपने निवास स्थान के आस-पास जो बस्ती बनाई थी, उसे उसने अपना नाम मालकेतु , ऐसा दिया था | इसी मालकेतु नाम का शाब्दिक अपभ्रंश् होकर मालखेड ( मालकेतु ) ग्राम का श्रीमद् भागवत तथ देवी भागवत में उल्लेख मिलता है | इसी मालखेड ( मालकेतु ) गांव से थोड़ी दूर वह भानुमति नदी के किनारे बैठकर वह आराधना किया करता था | उसकी इस नित्य आराधना से तथा भक्तिभाव से भगवती जगदम्बा प्रसन्न हुई तथा उसे साक्षात प्रकट होकर दर्शन दिया तथा मन इच्छित वर माँगने को कहा | तो केतुमाल ने धन-दौलत, कीर्ति न माँगते हुए हमेशा के लिए जिस रूप में दर्शन दिया है, उसी रूप में इस स्थान पर वास कीजिये तथा अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते रहिये, यह एकमेव वर सबके कल्याण के लिए माँग लिया | अपने भक्त के वर की पूर्णता करते हुए भगवती जगदम्बा ने तथास्तु कहा तथा स्वयंभू मूर्तिरूप में प्रगट होकर मलखेड़ निवासस्थानी अंबा भवानी नाम ग्रहण किया |

मनुष्य के लिए वेदों में तीन प्रकार की शुद्धता बताई गयी है | वे हैं १. कायिक , २. वाचिक , ३. मानसिक | स्नान करने से शरीर की शुद्धि हटी है | और तीर्थस्थान से मनकी शुद्धि होती है | मन पवित्र बनता है , मनोविकार नष्ट होता हैं, और ऐसा शुद्ध, पवित्र मन बनाकर भगवान के दर्शन के लिए जाना चाहिए | भगवान के दर्शन के लिए मन शुद्ध चाहिए और मन शुद्धि तीर्थ स्थान से होती है | ऐसा पवित्र तीर्थ मालखेड स्थित भानुमति गंगा है | इस भानुमति नदी के बारे में स्कंध पुराण में उल्लेख आया है की – भक्तिमुक्तिप्रदा भेशी भक्तस्वर्गापवर्गदा |

भागीरथी भानुमती भाग्य भोगवती भृति:

ऐसी यह भानुमती अपने भक्तों को भोग, मोक्ष, स्वर्ग तथा भक्ति अनुमति प्रदान करती है | पूर्व दिशा में रहने वाली दक्षिणवाहिनी गंगा भानुमति को हमेशा याद करके नमस्कार तथा स्नान करना चाहिए | किसी भी देवालय का दर्शन करने से पहले वहाँ के पवित्र तीर्थ जल का आचमन और स्नान मुख्य होता है | जिस प्रकार बालक माँ के पास आता है | तब उसका ह्रदय शांत तथा पवित्र हो जाता है | उसी प्रकार इस भानुमति का दर्शन, आचमन, तथा स्नान करने से भक्त का मान पवित्र बन जाता है | तथा जगत जननी माँ जगदम्बा के दर्शन का अधिकारी बन जाता है | दक्षिण वाहिनी गंगा बड़ी पवित्र है | पितरों के कर्म के लिए उसका विशेष महत्व है | दक्षि वाहिनी नदी के किनारे तर्पन, पिंडदान, श्राद्ध, अन्नदान, कालसर्पशं|दी त्रिपिंडी आदि कार्य करने से सहस्त्र गुणा फल प्राप्त होता है | ऐसा पुरनादि ग्रंथों में विवरण है | भानुमति प्रत्यक्ष गंगा स्वरुप है तथा दक्षिण वाहिनी भी है | इस कारण उपरोक्त कर्म के लिए पवित्र भी है | इसलिए इसमें स्नान , दान करना , मोक्ष और स्वर्ग का मार्ग अपने लिए खुला करने का साधन है |

माँ भगवती के अनुग्रह का प्रसाद

आज से करीब ३०० साल पहले इस मालखेड़ गाँव में कुछ लुटेरे डाका डालने को आ रहे थे | तो इस गाँव के निःसीम देवीभक्त सूर्यभानजी देशमुख पूर्वमुलकी पटेल ने भगवती की आराधना की तथा भगवती ने प्रसन्न होकर मुंगा रूप धारण किया और लुटेरों को अपनी टकराव से ही नदी के पार ही भगा दिया तथा संपूर्ण मालखेड़ ग्राम की रक्षा की | ऐसा कहा जाता है कि इ. स. सन १९४१ के दरम्यान इस इलाके में भूकंप का झटका आया था और उस संकट से डर-डर कर सभी मलखेड़ ग्रामवासी लोक माँ जगदम्बा की शरण में आये और तीन दिन मंदिर के आवास में ही बिताए और संकट से रहत पाई |

ऐसी ही एक बम्बई निवासी माँ की एक भक्त बोन टी. बी. से पीड़ित थी और अच्छे डॉक्टरों के द्वारा इलाज कर चुकी थी | एक दिन वह माँ के दर्शन को आयी और इस रोग से मुक्ति की याचना की तो उतने में ही वहाँ स्थित मधुमक्खियों का छत्ता उसके ऊपर गिर पडा और इन मक्खियों ने उसे इतना कटा कि उसे कोई पहचान भी न सके , ऐसा उसका शरीर फूल गया | दो चार दिन के बाद उसके शरीर पर कि सूजन उतर गयी तथा उसी वक्त डॉक्टरों से चेक करने से यह पता चला कि उसे बोन टी. बी. की किसी प्रकार की तकलीफ नहीं है | याने वह रोग मुक्त हो गई | माँ जगदम्बा ने मधुमक्खियों का रूप धारण करके उसके रोग का हरण कर लिया | यह माता जगदम्बा की जागृति का प्रत्यक्ष अनुभव है | यह घटना १९९९ की है | इसी प्रकार श्रीमान बालमुकुंदजी हेड़ा के वंशजों का ऐसा कहना है की, माताजी की कृपा से ही हमारा परिवार पुत्र-पौत्र धन संपदा से सुखी है | उनमें से ही एक भक्त बताते हैं कि, जब गुजरात में भूकंप हुआ था तो हमारे बच्चे वहाँ ही थे तथा जिस ईमारत में उनका निवास था, वह इमारत उस झटके से हिल गई थी | लेकिन भगवती की कृपाप्रसाद से ही वे सब सही सलामत रहे तथा हमारे परिवार का बहुत बड़ा संकट टल गया | भगवती की वे लोग हर साल नवरात्री में बड़ी धूम-धाम से पूजा अर्चना करते हैं | ऐसा ही एक मालखेड़ निवासी भक्त का कहना हैं कि अभी-अभी न्यूयॉर्क में हुए दहशत वादी हमलों से जो इमारतें नष्ट हुई हैं उनमे स्थित एक कार्यालय में मेरा लड़का कार्यरत था | लेकिन माँ भगवती के कृपाप्रसाद से वह सही सलामत बहार निकला | इसी प्रकार माता अम्बिका के साक्षत्व का अनुभव अनेक भक्तों को हुआ है तथा उनकी इछाएं पूरी करके किसी को पुत्र, किसी को धन, किसी को कीर्ति, और किसी को आरोग्यता प्राप्त हुई है | माताजी ने भक्तों के संकटों का निवारण किया और अपने स्वयंभू साक्षत्व का अनुभव दिलाया है | इस मंदिर परिसर में मनुष्य का अस्वस्थ मन प्रसन्न होकर उसे मानसिक शांति मिलती है तथ दुःख दर्द से छुटकारा मिलता है |

यहाँ का एक वैशिष्ट्य यह भी है कि शिवजी का मंदिर तथा भगवती का मंदिर एक ही जगह पर है |

मालखेड़ निवासिनी माँ जगदम्बा कि गौरव गाथा

देवी कि उपासन और शक्ति की आराधना आदिकाल से होती आ रही है | कभी इसकीइ गति मन्द हुई तो कभी तीव्र | इसके स्वरुप में भी समयानुसार परिवर्तन होता रहा है | राम युग में इसकी महत्ता विशेष रूप से बढ़ी | भगवान श्रीराम को जब विजय की कोई आशा दृष्टिगोचर नहीं हो रही थी, अन्धकार ही अन्धकार दिखाई दे रहा था, कुछ सूझ नै रहा था कि क्या किया जाये ? तभी उन्हें शक्ति की उपासना करने का सुझाव प्राप्त हुआ | श्रीराम ने कठोर तपस्या की और विधिवत यज्ञ करके शक्ति को प्रसन्न करके वरदान प्राप्त किया, परिणाम स्वरुप उन्हें विजयश्री प्राप्त हुई | तभी से शक्ति के प्रति लोगों की भाव-भक्ति बढ़ती ही गई | त्रेता युग के बाद द्वापर युग में भी इसकी महत्ता विद्यमान रही |

चैतन्य मूर्ति -

माताजी की मूर्ति बड़ी चैतन्य है, इसका सबसे बड़ा प्रमाण तो यह है कि मूर्ति स्थापित हुये हजारों साल हो गये, एक बड़ा लम्बा समय व्यतीत हो गया, इस बीच कई अच्छे और दुष्ट शासक हो गये | मूर्ति भंजकों का साम्राज्य भी बहुत दिन तक रहा, प्राकृतिक प्रकोप भी आये, आंधी, तूफान के साथ भूकम्प भी आये, लेकिन मूर्ति यथावत विद्यमान रही, उसका कुछ भी नहीं बिगड़ा और हजारों-हजारों लोगों के आस्था का यह केंद्र बानी रही |

श्रध्देय श्री देवेश्वर महाराज का पुण्यमय सान्निध्य

यह भी बड़े सौभाग्य क बात है कि यहाँ श्रद्धेय श्री देवेश्वर महाराज का पुण्यमय सान्निध्य प्राप्त होता है | श्री महाराजजी बहुत बड़े विद्वान हैं, शास्त्रों के ज्ञाता हैं, और देव वाणी संस्कृत पर आपका पूर्ण अधिकार है, इसके अतिरिक्त माताजी के बहुत बड़े भक्त हैं, उनकी सेवा में ही वे दिन-रात रमे रहते हैं | कभी-कभी वे अपने अनुभव की बातें बताते हैं | उनका कहना कि माताजी की कृपा से अनेक लोगों को चमत्कारिक ढंग से लाभ हुआ है | सहयोगियों के प्रति आभार -

इस पुस्तक प्रकाशन में अनेक महानुभवों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहयोग प्राप्त हुआ है, उनसे बौद्धिक, शारीरिक और आर्थिक सहायता प्राप्त हुई है, उन सभी के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं और प्रार्थना करते हैं की उन्हें माँ भगवती का सदैव आशीर्वाद मिलता रहे | यद्यपि सहयोगियों को अपने नाम के प्रकाशन की चाह नै है, फिर भी सौजन्यतावश हम उनके नामों का आदरपूर्वक उल्लेख कर हम अपने को धन्य समझ रहे हैं | उनके सम्माननीय नाम हैं - श्री नारायणदास हेडा, श्री अशोकराव देशमुख, श्री मधुकरराव देशपांडे, श्री अरुण मगरदे , श्री पुंडलीकराव सुने, श्री श्रवणकुमार जायसवाल, श्री रामभाऊ गुल्हाने, श्री घोटू देशमुख, श्री भैया सा. देशमुख, श्री अशोकराव जायसवाल, श्री अशोकराव गुजर, श्री सुरेश देशमुख, श्री राम जोशी आदि | इनके अतिरिक्त इस पुस्तक के सम्पादक श्री जगन्नाथ चौधरी "इच्छुक" का मैं विशेष रूप से आभारी हूँ | वे प्रकाण्ड विद्वान तो हैं ही साथ, ही अत्यन्त सरल हैं और मेरे ही नहीं अनेक लोग के साहित्यिक एवं आध्यात्मिक गुरु हैं, तथा मार्गदर्शक हैं | पत्रकारिता के क्षेत्र में आप भीष्म पितामह की तरह पूजित हैं | उन्हें मेरी विनंती को स्वीकार कर पुस्तक सामग्री के सम्पादन एवं प्रकाशन में सहयोग दिया है |

प्रकाशन कार्य को यथोचित रूप देने में श्रीरंग ऑफसेट, १२३, श्रम शिविर, इन्दौर प्रेस के मालिक श्री गिरीश चव्हाण एवं श्री शिरीष चव्हाण का जो उदारतापूर्ण सहयोग मिला है, उसे मैं कभी विस्मृत नहीं कर सकता | दोनों भ्राता अत्यन्त मृदु स्वाभाव के हैं | उनकी प्रवृत्ति केवल धन अर्जन की ही नहीं बल्कि उसके साथ सामाजिक एवं धार्मिक सेवा भावना की भी हैं | मैं पुनः उन्हें हार्दिक धन्यवाद देता हूँ |

विनीत

कृष्णकांत देवरे